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शान्ति पर्व
अध्याय २८३
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पराशर उवाच
वाणिज्यं पाशुपाल्यं च तथा शिल्पोपजीवनम् |  ३   क
शूद्रस्यापि विधीय़न्ते यदा वृत्तिर्न जाय़ते ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति