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शान्ति पर्व
अध्याय २८३
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पराशर उवाच
धर्म एव सदा नॄणामिह राजन्प्रशस्यते |  ८   क
धर्मवृद्धा गुणानेव सेवन्ते हि नरा भुवि ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति