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वन पर्व
अध्याय २८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवमात्मा पिता माता श्वश्रूः श्वशुर एव च |  १४   क
भर्तुः कुलं च सावित्र्या सर्वं कृच्छ्रात्समुद्धृतम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति