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वन पर्व
अध्याय २८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
तथैवैषापि कल्याणी द्रौपदी शीलसंमता |  १५   क
तारय़िष्यति वः सर्वान्सावित्रीव कुलाङ्गना ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति