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वन पर्व
अध्याय २८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रय़ाहि राजन्भद्रं ते घुष्टस्ते नगरे जय़ः |  ७   क
अध्यास्स्व चिररात्राय़ पितृपैतामहं पदम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति