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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
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पराशर उवाच
तपो हि वुद्धिय़ुक्तानां शाश्वतं व्रह्मदर्शनम् |  १०   क
अन्विच्छतां शुभं कर्म नराणां त्यजतां सुखम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति