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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
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पराशर उवाच
दुर्लभो हि मनुष्येन्द्र नरः प्रत्यवमर्शवान् |  १३   क
यो वै प्रिय़सुखे क्षीणे तपः कर्तुं व्यवस्यति ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति