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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
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पराशर उवाच
मनोनुकूलाः प्रमदा रूपवत्यः सहस्रशः |  २१   क
वासः प्रासादपृष्ठे च तत्सर्वं तपसः फलम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति