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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
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पराशर उवाच
नष्टप्रज्ञो यदा भवति तदा न्याय़ं न पश्यति |  २६   क
तस्मात्सुखक्षय़े प्राप्ते पुमानुग्रं तपश्चरेत् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति