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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
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पराशर उवाच
नित्यं भद्राणि पश्यन्ति विषय़ांश्चोपभुञ्जते |  २८   क
प्राकाश्यं चैव गच्छन्ति कृत्वा निष्कल्मषं तपः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति