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शान्ति पर्व
अध्याय २८४
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पराशर उवाच
गृहाण्याश्रित्य गावश्च क्षेत्राणि च धनानि च |  ३   क
दाराः पुत्राश्च भृत्याश्च भवन्तीह नरस्य वै ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति