शान्ति पर्व  अध्याय २८४

पराशर उवाच

स जानन्नपि चाकार्यमर्थार्थं सेवते नरः |  ८   क
वालस्नेहपरीतात्मा तत्क्षय़ाच्चानुतप्यते ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति