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वन पर्व
अध्याय २८४
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वैशम्पाय़न उवाच
कुण्डलार्थे व्रुवंस्तात कारणैर्वहुभिस्त्वय़ा |  १६   क
अन्यैर्वहुविधैर्वित्तैः स निवार्यः पुनः पुनः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति