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वन पर्व
अध्याय २८४
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वैशम्पाय़न उवाच
रत्नैः स्त्रीभिस्तथा भोगैर्धनैर्वहुविधैरपि |  १७   क
निदर्शनैश्च वहुभिः कुण्डलेप्सुः पुरन्दरः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति