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वन पर्व
अध्याय २८४
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जनमेजय़ उवाच
यच्चापि ते भय़ं तीव्रं न च कीर्तय़से क्वचित् |  २   क
तच्चाप्यपहरिष्यामि सव्यसाचाविहागते ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति