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वन पर्व
अध्याय २८४
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वैशम्पाय़न उवाच
अमृतादुत्थितं ह्येतदुभय़ं रत्नसम्भवम् |  २०   क
तस्माद्रक्ष्यं त्वय़ा कर्ण जीवितं चेत्प्रिय़ं तव ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति