वन पर्व  अध्याय २८४

कर्ण उवाच

को मामेवं भवान्प्राह दर्शय़न्सौहृदं परम् |  २१   क
कामय़ा भगवन्व्रूहि को भवान्द्विजवेषधृक् ||  २१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति