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वन पर्व
अध्याय २८४
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कर्ण उवाच
श्रेय़ एव ममात्यन्तं यस्य मे गोपतिः प्रभुः |  २३   क
प्रवक्ताद्य हितान्वेषी शृणु चेदं वचो मम ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति