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वन पर्व
अध्याय २८४
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कर्ण उवाच
प्रसादय़े त्वां वरदं प्रणय़ाच्च व्रवीम्यहम् |  २४   क
न निवार्यो व्रतादस्मादहं यद्यस्मि ते प्रिय़ः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति