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वन पर्व
अध्याय २८४
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कर्ण उवाच
दास्यामि विवुधश्रेष्ठ कुण्डले वर्म चोत्तमम् |  २७   क
न मे कीर्तिः प्रणश्येत त्रिषु लोकेषु विश्रुता ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति