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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रान्ये व्याहरन्ति स्म वानराः पटुमानिनः |  २५   क
समर्था लङ्घने सिन्धोर्न तु कृत्स्नस्य वानराः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति