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वन पर्व
अध्याय २८४
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कर्ण उवाच
पुरुषस्य परे लोके कीर्तिरेव पराय़णम् |  ३४   क
इह लोके विशुद्धा च कीर्तिराय़ुर्विवर्धनी ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति