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वन पर्व
अध्याय २८४
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वैशम्पाय़न उवाच
अहं ते राजशार्दूल कथय़ामि कथामिमाम् |  ४   क
पृच्छते भरतश्रेष्ठ शुश्रूषस्व गिरं मम ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति