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शान्ति पर्व
अध्याय २८५
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जनक उवाच
यत्र तत्र कथं जाताः स्वय़ोनिं मुनय़ो गताः |  ११   क
शूद्रय़ोनौ समुत्पन्ना विय़ोनौ च तथापरे ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति