शान्ति पर्व  अध्याय २८५

पराशर उवाच

पितामहश्च मे पूर्वमृश्यशृङ्गश्च काश्यपः |  १४   क
वटस्ताण्ड्यः कृपश्चैव कक्षीवान्कमठादय़ः ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति