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शान्ति पर्व
अध्याय २८५
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जनक उवाच
विशेषधर्मान्वर्णानां प्रव्रूहि भगवन्मम |  १९   क
तथा सामान्यधर्मांश्च सर्वत्र कुशलो ह्यसि ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति