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शान्ति पर्व
अध्याय २८५
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जनक उवाच
यदेतज्जाय़तेऽपत्यं स एवाय़मिति श्रुतिः |  २   क
कथं व्राह्मणतो जातो विशेषग्रहणं गतः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति