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शान्ति पर्व
अध्याय २८५
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पराशर उवाच
कृषिश्च पाशुपाल्यं च वाणिज्यं च विशामपि |  २१   क
द्विजानां परिचर्या च शूद्रकर्म नराधिप ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति