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शान्ति पर्व
अध्याय २८५
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पराशर उवाच
स्वेषु दारेषु सन्तोषः शौचं नित्यानसूय़ता |  २४   क
आत्मज्ञानं तितिक्षा च धर्माः साधारणा नृप ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति