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शान्ति पर्व
अध्याय २८५
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पराशर उवाच
विकर्मावस्थिता वर्णाः पतन्ति नृपते त्रय़ः |  २६   क
उन्नमन्ति यथासन्तमाश्रित्येह स्वकर्मसु ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति