शान्ति पर्व  अध्याय २८५

पराशर उवाच

न चापि शूद्रः पततीति निश्चय़ो; न चापि संस्कारमिहार्हतीति वा |  २७   क
कृतम् ||  २७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति