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शान्ति पर्व
अध्याय २८५
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जनक उवाच
किं कर्म दूषय़त्येनमथ जातिर्महामुने |  ३१   क
सन्देहो मे समुत्पन्नस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति