आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४६

युधिष्ठिर उवाच

पृथामेव तु शोचामि या पुत्रैश्वर्यमृद्धिमत् |  ७   क
उत्सृज्य सुमहद्दीप्तं वनवासमरोचय़त् ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति