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वन पर्व
अध्याय ५८
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वृहदश्व उवाच
एते गच्छन्ति वहवः पन्थानो दक्षिणापथम् |  २०   क
अवन्तीमृक्षवन्तं च समतिक्रम्य पर्वतम् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति