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वन पर्व
अध्याय २८५
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सूर्य उवाच
शक्या वहुविधैर्वाक्यैः कुण्डलेप्सा त्वय़ानघ |  १३   क
विहन्तुं देवराजस्य हेतुय़ुक्तैः पुनः पुनः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति