वन पर्व  अध्याय २८५

सूर्य उवाच

उपपत्त्युपपन्नार्थैर्माधुर्यकृतभूषणैः |  १४   क
पुरन्दरस्य कर्ण त्वं वुद्धिमेतामपानुद ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति