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वन पर्व
अध्याय २८५
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सूर्य उवाच
तस्मान्न देय़े शक्राय़ त्वय़ैते कुण्डले शुभे |  १७   क
सङ्ग्रामे यदि निर्जेतुं कर्ण कामय़सेऽर्जुनम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति