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द्रोण पर्व
अध्याय ३७
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सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्कुमारस्य रणे विक्रीडितं महत् |  २   क
विभित्सतो रथानीकं भारद्वाजेन रक्षितम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति