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शान्ति पर्व
अध्याय २८६
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पराशर उवाच
पिता सखाय़ो गुरवः स्त्रिय़श्च; न निर्गुणा नाम भवन्ति लोके |  १   क
अनन्यभक्ताः प्रिय़वादिनश्च; हिताश्च वश्याश्च तथैव राजन् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति