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शान्ति पर्व
अध्याय २८६
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पराशर उवाच
भावितं कर्मय़ोगेन जाय़ते तत्र तत्र ह |  १७   क
इदं शरीरं वैदेह म्रिय़ते यत्र तत्र ह |  १७   ख
तत्स्वभावोऽपरो दृष्टो विसर्गः कर्मणस्तथा ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति