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भीष्म पर्व
अध्याय १०५
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सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़शरैर्भग्नं द्रवमाणमितस्ततः |  १८   क
भीमो ह्येष दुराधर्षो विद्रावय़ति मे वलम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति