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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्ननुगते धर्मं पुरुषे पुरुषोऽपरः |  ५२   क
निश्चक्राम ततस्तस्मात्पृष्टश्चाह महात्मना |  ५२   ख
वृत्तं प्रह्राद मां विद्धि यतः सत्यं ततो ह्यहम् ||  ५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति