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शान्ति पर्व
अध्याय २८६
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पराशर उवाच
रणाजिरे यत्र शराग्निसंस्तरे; नृपात्मजो घातमवाप्य दह्यते |  ३   क
प्रय़ाति लोकानमरैः सुदुर्लभा; न्निषेवते स्वर्गफलं यथासुखम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति