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शान्ति पर्व
अध्याय २८६
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पराशर उवाच
इय़ं हि योनिः प्रथमा यां प्राप्य जगतीपते |  ३२   क
आत्मा वै शक्यते त्रातुं कर्मभिः शुभलक्षणैः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति