शान्ति पर्व  अध्याय २८६

पराशर उवाच

यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुष्यमिह वै नरः |  ३४   क
धर्मावमन्ता कामात्मा भवेत्स खलु वञ्च्यते ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति