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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
हते कर्णे न दिशो विप्रजज्ञु; स्तमोवृता द्यौर्विचचाल भूमिः |  ५०   क
पपात चोल्का ज्वलनप्रकाशा; निशाचराश्चाप्यभवन्प्रहृष्टाः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति