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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८८
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वैशम्पाय़न उवाच
इदमन्यच्च कौन्तेय़ वचः स पुरुषोऽव्रवीत् |  १८   क
धनञ्जय़स्य नृपते तन्मे निगदतः शृणु ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति