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शान्ति पर्व
अध्याय २८७
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पराशर उवाच
न धर्मकालः पुरुषस्य निश्चितो; न चापि मृत्युः पुरुषं प्रतीक्षते |  १७   क
क्रिय़ा हि धर्मस्य सदैव शोभना; यदा नरो मृत्युमुखेऽभिवर्तते ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति