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शान्ति पर्व
अध्याय २८७
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भीष्म उवाच
किं श्रेय़ः का गतिर्व्रह्मन्किं कृतं न विनश्यति |  २   क
क्व गतो न निवर्तेत तन्मे व्रूहि महामुने ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति