शान्ति पर्व  अध्याय २८७

पराशर उवाच

नीहारेण हि संवीतः शिश्नोदरपराय़णः |  २५   क
जात्यन्ध इव पन्थानमावृतात्मा न वुध्यते ||  २५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति